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अहिल्या बाई के शासक की कुछ रोचक बातें जो आपको जानना जरूर हैं!

निर्मित कलात्मक १. मंदिर में  


पूना मार्ग पर चौड़ी गांव में पड़ाव के दौरान शिव मंदिर में मल्हारराव होलकर ने बालिका अहिल्या को पूजा-अर्चना करते देखा ! तभी मल्हारराव ने एक निर्णय लिया ! यह बालिका मेरी पुत्र-वधु बनेगी !

२. विवाह 




मल्हारराव होलकर ने अहिल्या के पिता पटेल मणकोजी शिंदे के सामने अपने पुत्र खंडेराव के साथ अहिल्या का विवाह का प्रस्ताव रखा ! तदनुसार सन १७३३ में विवाह सम्पन हुआ ! विवाह में वर-वधु को आशीर्वाद देने बाजीराव पेशबा के साथ सभी लोग उपास्थित थे !

३. शिक्षा प्रशिक्षण 



मल्हारराव  ने अहिल्या को सैन्य शिक्षा, घुड़सवारी, शस्त्र-विधा, राजकार्य की  मंत्रणा,  उलझे हुए राजशासन का गणित आदि का प्रशिक्षण देना शुरू किया !

४. शासन


मल्हारराव होलकर के मार्गदर्शन में अहिल्याबाई राजकार्य करने  में निपुण हो गई  एवं शासन कार्य में आनेवाली समस्याओं को सफलतापूर्वक सुलझाने में भी प्रवीण होती गई !

५. खंडेराव की मृत्यु 



अहिल्या अक्सर मल्हारराव और खंडेराव के साथ युद्ध में जाती थी ! सन १७५४ में जब मल्हारराव राधोबा पेशबा के रथ कुंभेरि किले पर सूरजमल जाट पर घेरा डाले हुए थें ! मराठों और जाटों में घमासान युद्ध हुआ ! २४ मार्च १७५४ को खंडेराव की युद्ध में एक तोप को गोला लगने से मृत्यु हो गई !

६. सती ?



पत्नीधर्म का पालन करते हुए अहिल्याबाई ने पति के साथ सहगमन करने की तैयारी की ! परन्तु यह  सुनकर  मल्हारराव का हृदय विलाप  कर उसने कहने लगा- " बेटी वह तो छोड़ गया किन्तु आज से तुम ही मेरा  बेटी हो ! मुझे निपुत्रिक ना कर ! सहगमन का इरादा त्याग दे ! यदि तुम अपने  निश्चय पर अटल हो तो प्रथम मुझे अपने प्राण-त्यागने दो ! " ससुर का विलाप सुन देवी ने अपना सती होने का इरादा त्याग दिया !

७. प्रजा  के सुख - दुःख: में सहभागी 



जब भी  मल्हारराव युद्ध पर जाते अहिल्या उनकी ओर से राज्य प्रशासन का कार्य  देखती ! शहर का दौरा करती ! छोटी से छोटी शिकायतें सुन उचित न्याय देती ! प्रजा के दुःख: निवारण करती ! लगान बसूल करती ! मल्हारराव के लिए आवश्यक धन, सेना, गोला बारूद आदि की व्यवस्था करती !

८. निष्पक्ष न्यायदायिनी 



अहिल्याबाई के न्याय दरबार  में निष्पक्ष न्याय व्यवस्था थी, अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, भाई-भतीजा या जातिगत  आधार पर उनका न्याय प्रभावित नहीं होता था ! दुर्जनों और  दुष्टो का अपराध सिद्ध होने पर तुरंत  कठोर दण्ड दिया जाता था !

९. शिस्तबद्धता 


अहिल्याबाई के एक नजदीकी रिश्तेदार, तकोजीराव होलकर पाटिलबाबा- महादजी शिंदे के छत्रछाया में रहते थे ! देवी के कामों में दखलअंदाजी कर उन्हें परेशान करते रहते थे !  परन्तु अहिल्याबाई  शिस्तबद्धता रखते हेतु उन्हें सुनाती है -

" मैं सुभेदार मल्हारराव की बहु हूँ और तुकोजी बाबा मेरे मुलाजिम है ! इसके बावजूद भी यदि आपके मन में कोई दुराग्रह हो तो आप दोनों अपने फौज समेत मेरा सामना करने आ सकते है ! मेरे सिरपर भगवान मार्तण्ड एवं सुभदारजी का वरदहस्त हैं ! सो जो होगा श्री की इच्छा समझूंगी !"

१०. नव-निर्माण 


काफी सोच विचार के पश्चात अहिल्याबाई ने महेश्वर को नई राजधानी के लिये चुना ! प्राचीन महिष्मति, नर्मदा नदी के किनारे बसा एक सुन्दर धार्मिक तथा व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर था ! पुराने मंदिरो का  जीर्णाेद्धार, प्रासाद, घाट आदि का निर्माण करने हेतु अनेक मजदूरों, कारिगरों एवं शिल्पियों को रोजगार मिला !  निर्मित कार्य का अहिल्याबाई स्वमं निरीक्षण करती !     

११. प्रजा पालन जन कल्याण कार्य 


अहिल्याबाई के प्रशासन में अनेक आदर्श लोक-कल्याणकारी योजनाएँ थी ! उन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण किया, जीर्णाेद्धार भी किया ! नदियों पर घाट बनाए ! धर्मशालाओं का निर्माण किया !  सड़को का निर्माण क्र वृक्ष लगाये ! पेयजल हेतु कुए बावडिओं और तालाबों का निर्माण किया !  अपने राज्य में ही नहीं, सम्पूर्ण देशभर में तीर्थस्थलों पर अन्नक्षेत्र प्रारंभ किये यात्रीगण, अपंग, असहाय, गोर-गरीबों की ठहरने खाने पीने की व्यवस्था थी !  

सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक उन्नति के जो समस्त कार्य उन्होंने किये वह उन्हें अपने श्वसुर से प्राप्त "खासगी " १६ करोड़ की सम्पत्ति में से ही किये ! इस कार्य हेतु  राज्य के खजानें का दुरूपयोग उन्होनें नहीं किया ! समस्त निर्मित कार्यो का निरिक्षण वह स्वंय करती !   

१२. अन्नक्षेत्र, धर्मशाला, धार्मिक स्थान आदि 


तीर्थ क्षेंत्रो में तीर्थयात्रियों की स्थान-संध्या, पूजा-अर्चना तथा निवास-भोजन की समुचित व्यवस्था के लिए धर्मशालाएँ, अन्नक्षेत्रों का निर्माण किया ! यात्रीगण, अपंग, असहाय, गोर-गरीबों की ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था की ! उनके द्वारा निर्मित किए गए निर्माण कार्यों का स्तर तकनीकी दृष्टि से बहुत श्रेष्ठ, सुंदर, कलात्मक और भव्यतापूर्ण है ! ये निर्माण भारतीय वास्तुकला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं ! उनके द्वारा अन्य धर्मावलंबिओं के धार्मिक स्थनों- जैसे मस्जिदो,  दरगाहों आदि के लिये भी अनुदान दिये जाने के प्रमाण मिलते है ! 

१३. उद्दोग-धंधे वस्त्र-उद्दोग 


व्यापार को बढाने के लिए अहिल्याबाई ने बहुत प्रोत्साहज  दिया !  राज्य में बाहर से व्यापारियों को लेकर बसाया तथा उन्हें सहायता पहुँचाई !

उस काल में मैसूर राज्य में  अकाल पड़ा तो  भूख प्यास  से  हजारों व्यक्ति मर गये ! अहिल्याबाई ने वहाँ  से सैकड़ो बुनकरों को लाकर महेश्वर में बसाया  और उन्हें रोजगार, आर्थिक सहयोग तथा रहने को मकान दिये! महेश्वर के किले में हाथकरधे (खड़िडयाँ) लगाएँ और उन हथकरघों पर उनको लगाया !  उन हाथ करघों  में बनी साड़ियों ने ज;जल्दी ही उद्दोग में पकड़ कर ली जिससे साड़ी उद्दोग प्रगति के  पथ पर अग्रसर हुआ ! आज भी देश-विदेशों में  महेश्वरी साड़ी प्रसिद्ध है  !     

१४. उधोग- धंधे टेराकोटा 


अहिल्याबाई ने भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों पर धर्मशालाएँ, सदावतें, अन्नक्षेत्र का निर्माण किया ! वहाँ अपंग, गरीब, असहाय लोगो की रहने-खाने की व्यवस्था की तथा वहाँ के ग्रमोधोगो को प्रोत्साहित किया जिससे देश-विदेश के  लोग तीर्थक्षेत्रों में ग्रामोघोगांतगर्त निर्मित कलात्मक वस्तुओं को क्रय करते ! छोटे-छोटे व्यापारियों को इसका फायदा होता तथा उनके छोटे-छोटे उघोगों को बरकेत होना शुरू हुआ ! हिन्दु मुस्लिम सभी कलाकार, शिल्पी की ऐसी कलात्मक वस्तुओं की निर्मिति करने में अपना योगदान देने लगे !  

१५. ग्रामोघोग- बांस काम 


ग्रामोघोगांतगर्त बुनकर, शिल्पी, कारागिरों  साथ-साथ "बांस काम" कारागिरों को भी बहुत  प्रोत्साहन  मिला ! घरेलू उपकरणों के साथ-साथ कृषि उत्पादन के लिए उपयोग में लाए जाने वाली वस्तुएँ भी पैमाने पर उत्प्न्न किए जाने लगी ! कलात्मक वस्तु तीर्थक्षेत्रो पर बिक्री के लिए उपलब्ध कराई जाती ! सामाजिक व आर्थिक पुनर्रचना में सहयोग मिला !  

१६. पर्यावरण (सड़के, वृक्ष, तालाब )


अहिल्याबाई ने जो सम्पूर्ण भारत के लिए आवश्यक लोकोपयोगी कार्य किए उसमें प्रमुखत: कलकत्ता से काशी तक पक्की सड़क  का निर्माण, लंबी सड़कों का निर्माण कर वृक्षों को लगाना, पेयजल के लिए तालाबों का निर्माण किया ! उनकी देखरेख के लिए व्यवस्थापकों की नियुक्तियाँ की ! और उन्हें राज्य की ओर से वेतन निर्धारिक किया !  

१७. गोंड -भिल्लों का उपद्रव 


मालव संभाग में गोंड भिल्लों के उपद्रव, चारों ओर लूटपाट, राहजनी, डकैती आदि  का प्राबल्य था ! अत: अहिल्याबाई ने दरबार में घोषणा की जो कोई चोर, डाकुओं का पारिपत्य करेगा ! उसके होगा ! यशवंतराव फणसे ने यह बीड़ा उठाया और उनका पक्का बंदोबस्त कर दिया !    

१८. प्रतीज्ञा पूर्ति का फल 


वीर युवक यशवंत राव फणसे ने चोर डाकुओं का सफाया करने की प्रतीज्ञा ली थी ! बुद्धिमान और साहसी युवक ने अपनी प्रतीज्ञा पूर्ती की ! ततपश्चात अहिल्याबाई की पुत्री मुक्ताबाई से उनका विवाह हुआ !

१९. गोंड -भिल्लों को अभय   


राजनीतिज्ञ अहिल्याबाई ने गोंड-भिल्लों को अभय दिया ! उनसे खेती कार्य करवाया !  व्यापारी, तीर्थयात्री, राहगीर आदि का रक्षण करने का महत्वपूर्ण कार्य उन्हें सौंंपा !

२०. राघोबा पेशबा की सोच और महेश्वर पर चढ़ाई 


राघोबा पेशबा के साथ गंगाधर चन्द्रचुड़ ने षडयंत्र रचाकर उन्हें मालवा पर चढ़ाई करने के लिए उघुक्त किया ! मालवा पर चढ़ाई करने के इरादे से राघोबा पेशबा ससैन्य क्षिप्रा पार पड़ाव डाले बैठे थे !  अहिल्याबाई ने लड़ाई की तैयारी तो की और उन्होंने पेशवा को संदेश भी भेजा कि स्त्री के साथ युद्ध करने में यदि आपको पराजय का मुँह देखना पड़े तो आपकी ही जग हंसी होगी ! अहिल्याबाई के सैन्य  में दो सौ 'स्त्री घुड़सवार सैनिक' थी ! स्त्री-सैन्य देख पेशवा भी गड़बड़ा गए ! अत: उन्होंने बहाना बनाया की वह मातमपुसी के लिये आए हैं न कि लड़ाई के लिए !        

२१. चन्द्रवतों का पराभव 


रामपुरा का चन्द्रावत राजवंश अहिल्याबाई के अच्छे बतांव और उदारता को उनकी कमजोरी समझ बारबार विद्रोह किया करते थे !  अहिल्याबाई उनके विरुद्ध धैर्य तथा साहस से युद्ध संचालन कर उनको पराजित करती  थी ! रामपुरा  के युद्ध में सरदार सौभागसिंह चन्द्रावत बन्दी बना लिया गया ! अहिल्याबाई ने सौभागसिंह को  तोप  के मुंह से बाँधकर उड़ा दिया !

  

२२. पेशवा द्वारा सम्मान 


अहिल्याबाई को राजपूतों के विद्रोह  की खबर लगते ही उन्होंने तुरंत वहाँ अपनी सेना भेज दी साथ ही पूना में पेशवा को भी सूचित कर दिया और अहिल्याबाई स्वयं भी युद्ध क्षेत्र में पहुँच गई ! उनके नेतृत्व में होलकर सेना राजपूतों की सेना से भीड़ गई ! देखते ही देखते राजपूतों  की सेना तितर-बितर हो गई ! अहिल्याबाई की विजय हुई ! इस विजय की खबर पूना के श्रीमंत पेशवा के पास पहुंची ! उन्होने इस विजय का बड़ा भारी उत्सव मनाया ! अहिल्याबाई के सम्मान में तोपें दागी गई !  

२३. नि:सन्तान विधवाओं को दतक पुत्र का अधिकार 


अहिल्याबाई ने प्रजा के लिए अहितकर कानूनों  हटा दिया तथा अनेक नये कानून भी बनाये, जिससे प्रजा को लाभ हो ! उन्होंने नि:संतान विधवाओं के धन को शासन द्वारा जप्त कर लेने के कानून को हटा कर विधवाओं को दतक पुत्र लेने का, अपने धन का उपयोग करने का नया कानून बनाया और करों को कम कर दिया ! इससे प्रजा को बहुत लाभ हुआ ! घूसखोरी तथा रिश्वत पर अकुंश लगाने हेतु वह अपराधी को उचित दण्ड भी देती !    

२४. पंचायतो को न्याय अधिकार 


 अहिल्याबाई ने न्यायालयों की स्थापना की, ताकि प्रजा को उचित न्याय मिल सके ! और रिश्वतखोर, कामचोर व प्रजा को सताने वाले कर्मचारियों को दण्ड मिले ! साथ ही ग्राम पंचायतों की स्थपना कर उन्हें न्याय के अधिकार भी सौंपे !

२५. कवि अनन्तफंदी दरबार में  


महाराष्ट्र के संगमनेर का कवि अनन्तफंदी नाच-गाकर "लावणी" सुनाया करता था ! दान की अभिलाषा से वह महेश्वर के लिए चल पड़ा ! रास्ते में सतपुड़ा पहाड़ में भीलों उसे लूट लिया और कैद कर लिया ! उसने भील सरदार और भीलों के सामने "लावणी" गाना शुरू किया ! गाना सुनकर प्रसन्न एवं आनन्दित भील सरदार ने उसे पूंछा- कहा जाओगे ? अनन्तफंदी ने कहा देवी अहिल्याबाई के दर्शन करने महेश्वर जा रहा हूँ ! सुनते ही सरदार ने चार-पांच भिलों को साथ देकर 'महेश्वर' पहुंचा दिया ! अहिल्याबाई के समक्ष श्रृंगार रस कविता सुनाकर उपहार पाया ! अहिल्याबाई ने उसे समझ दी कि तुम यदि श्रृंगार रस के बदले भक्ति रस का काव्य सुनाओगे तो उससे लोगों का भी हिट होगा और तुम्हारा भी परलोक सुधरेगा ! 

अहिल्याबाई का वचन सुनकर अनन्तफंदी ने भक्तिरस का काव्य सुनाना शुरू कर दिया !

अहिल्याबाई पूना यात्रा पर जा रही थी ! रास्ते में कवि अनन्तफंदी के भक्तिरस काव्य को सुना ! प्रसन्न होकर उन्होंने अपना कंगन उसे दे दिया ! 

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