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होलकर राज्य की स्थापना और राजवाड़ा पैलेस का इतिहास, समय, प्रवेश शुल्क --- इंदौर।

 


 इन्दौर स्थित राजवाड़ा मालवा के मराठों के चर्मोत्कर्ष काल की भव्य इमारत है. 1747 ई. के आस - पास मल्हारराव होलकर ने अपने परिवार के निवास हेतू इस महल का प्रारंभिक निर्माण करवाया था. 1801 में सिंधिया के सेनापति सरजेराव घाटके ने राजवाड़ा जला दिया था. 1818 से 1826 के बीच आग से बचे प्रवेश व्दार की ऊपर की मंजिल पुनः ठीक की गयी. इस कार्य में होलकरों के प्रधानमंत्री तात्याजोग ने अपना अथक योगदान दिया और इस प्रकार 1826 से 1833 के मध्य वर्तमान की पूर्ण इमारत का निर्माण हुआ. दुर्देव से 1834 में आग लगने से लकड़ी से बनी एक मंजिल नष्ट हो गयी. 1844 में तुकोजीराव व्दितीय को गोद लिया गया तब होलकर वंश का 1852 में प्रथम राजतिलक इसी भवन में हुआ तभी इस भवन में जरुरी सुधार व परिवर्तन भी हुए, वर्ष 1984 में इसका पृष्ठ भाग जल गया. राजवाड़ा के निर्माण के तीन विभिन्न चरण दृष्टिगत होते है। प्रथम तीन मंजिल पत्थर की बनी हुई राजपूत शैली का परिचायक है। चौथी से लेकर सातवी मंजिल मराठा शैली की जिसमें लकड़ी का कार्य अधिक है। स्थापत्य की दृष्टि से राजवाड़ा मुस्लिम, राजपूत मराठा इतावली स्थापत्व का मिश्रित रुप है। इसका दक्षिणी हिस्सा मुगल स्थापत्त्य एवं पूर्वी व्दार मराठा स्थापत्य तथा गणेश हॉल, दरबार हॉल आदि फ्रेंच बैसेलिक शैली का बना है। प्रवेश व्दार की रचना हिन्दु शैली के राज प्रसादों की भाँती है। जिसके झरोखों का निर्माण दर्शनीय है। भवन का दक्षिणी भाग स्पष्ट रुप से बार-बार पुनर्निर्माण का द्योतक है। भवन के निर्माण में पत्थर व चूने का प्रयोग अधिक हुआ है. साथ ही काष्ठ शिल्प का भी कलात्मक प्रयोग किया गया है. पत्थर के मेहराब, गुम्मद व स्तम्भों पर सुंदर नक्काशी है. प्रदेश का यह सबसे ऊँचा एवं सुंदर मराठा स्मारक है जो युग पुरुष की भाँति 250 वर्षों से मालवा के इतिहास की यादों को अपने हृदय में संजोये हुये है. 

राजवाड़ा का समय सुबह 10 बजे से 6 बजे तक का रहता है और इसमें जाने जा का शुल्क 20 रुपए पर व्यक्ति आता है साथ में विदेशी व्यक्ति का शुल्क 400 रुपए आता है 

होलकर राज्य की स्थापना और राजवाड़े का इतिहास

औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मराठों की अभियान भारत पर आरम्भ हुए और पेशवा बाजीराव के अधीन मल्हारराव होलकर को इन अभियानों का नेता बनाया गया । ई. 1730 में जब मराठा सेनायें उत्तर भारत में थी तब पेशवा के भाई सदाशिव के माध्यम से मल्हारराव ने छत्रपति साहू को यह निवेदन किया कि जब मैं सैनिक अभियानों में रहता हूँ तब मेरे परिवार के भरण-पोषण एवं निवास की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं रहती । यदि इसके लिए मुझे कोई खासगी जागीर प्रदान कर दी जाय तो मैं सैनिक सेवा का निर्वहन और भी अच्छी तरह से कर सकूंगा। पेशवा बाजीराव ने छत्रपति साहू की अनुमति लेकर मल्हारराव की प्रथम पत्नी गौतमाबाई होलकर के नाम से 1734 में खासगी जागीर की सनद तैयार करवाई जिसमें मालवा एवं खानदेश के अनेक गांवों के साथ-साथ इन्दौर को भी सम्मिलित कर दिया गया। खासगी जागीर की प्राप्ति के पश्चात मल्हारराव होलकर के परिवार ने इन्दौर में स्थायी निवास बनाया । .

ई. 1724 के एक पत्र में सुभा इंदुर सरकार उज्जैन प्रान्त मालवा का उल्लेख है । होलकर के पूर्व इन्दौर में मुगलों के कमाविसदार का परगना का कार्यालय था, जिसे ई. 1724 में मराठो ने हस्तगत कर पेशवा के भाई चिमणाजी बल्लाल को मुकासे में सौपा था. बाद में सन् 1732 में इन्दौर परगना मल्हारराव होलकर को दिया गया। सन् 1740 ई. में बाजीराव पेशवा की मृत्यु के बाद मालवा की सुबेदारी मल्हारराव होलकर को दी गई, इस तरह होलकर सरकार की स्थापना हुई। इस वर्ष कस्बे इन्दौर के मारुति खेड़ापति की पूजा का भार बैरागी रूपदास को जागीर देकर सौपा गया व मुरादशाह फकीर को जो वहां का पुराना पुजारी था हटाया गया। सन 1740 में चतुर्भुजदास कानूनगो को मल्हारराव ने निर्देश दिये कि वे इन्दौर में बस्ती बढ़ाने हेतु आस पास के व्यापारियों को लाकर बसाने हेतु और प्रोत्साहित करें ।

पूर्व में मराठों के सभी कारभारी कमाविसदार की कचहरी में रुका करते थे । उन्हें कहा गया कि वे सरकारी वाडे में जो हाकिमवाड़ा के नाम से प्रसिद्ध था, मे ही रुका करे । सरकारी वाडे में भोजराज बारगल का निवास था । ई. 1747 के आस- पास खाननदी के किनारे सरकारी वाडा बांधने का कार्य प्रारंभ हुआ। इसके पूर्व होलकर सरकार की कहचरी के लिये खान नदी के किनारे चतुर्भुजदास कानूनगो इन्दौर का वाड़ा था वह लिया गया व सरकारी वाडे के पास कानूनगो को रहने के लिये स्थान दिया गया । इतिहासिक तथ्यों में प्रकट होता है कि इस राजवाड़े का निर्माण कार्य सन् 1747 ई. के आस पास प्रारंभ हुआ । भवन पुरी तरह से बन भी नहीं पाया था कि ई. 1761 में पानीपत के युद्ध में मराठा सेनाओं की अपमानजनक पराजय हुई | वृद्ध मल्हारराव इस आघात को अधिक दिनों तक सह नहीं सके। और मई 1765 में आलमपुर के समीप उनका स्वर्गवास हो गया। गौतमाबाई 1760 में ही मर चुकी थी । अत: खासगी जागीर का उत्तराधिकारी पुत्रवधू अहिल्याबाई को मिला । अहिल्याबाई धार्मिक स्वभाव की महिला थी। उन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया, किन्तु इन्दौर नगर होलकरों की सैनिक छावनी बना रहा ।

कालांतर में यशवंतराव होलकर प्रथम ने भानपुरा को अपनी राजधानी बनाया, किन्तु 1811 ई. में विक्षिप्त अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी तुलसाबाई होलकर ने अल्पवयस्क पुत्र मल्हारराव द्वितीय को संरक्षिका के रूप में शासन किया । सैनिक विद्रोह और अंग्रेजों की कूटनीति के कारण महिदपुर के युद्ध में अंग्रेजों के साथ होलकर सेना को पराजित होना पड़ा । तत्पश्चात मेजर जनरल सरजान मालकम और होलकर प्रधान मंत्री तात्या जोग के मध्य सन् 1818 ई. में मन्दसौर की महत्वपूर्ण संधि की गई । संधि की एक शर्त यह भी थी कि होलकर को इन्दौर नगर को राजधानी बनाना होगा। अब होलकर परिवार इन्दौर लाया गया तब उनके पास न तो वस्त्र थे और न ही मकान । ऐसी परिस्थिति में सरजान मालकम ने होलकर के एक दूसरे वाड़े में ‘आधुनिक भंडारी हाई स्कूल में राज परिवार के रहने की अस्थायी व्यवस्था की । तात्य जोग ने पर्याप्त कुशलता से प्रशासन चलाया और ई. 1818 से 1833 के मध्य वर्तमान राजवाड़े की पूर्ण इमारत का निर्माण हुआ तथा जिस भाग को सरजेराव घाटके ने विनष्ट कर दिया था उसको दुरुस्त करवाया गया ।

दुर्देव से ई. 1834 में आग लग जाने के कारण लकड़ी की बनी हुई एक मंजिल नष्ट हो गई। ई. 1844 में जब तुकोजीराव द्वितीय को गोद लिया गया तब होलकर वंश का प्रथम महोत्सव इसी भवन में हुआ । तत्पश्चात इस भवन में कुछ आवश्यक सुधार एवं परिवर्तन भी किये गये । समग्ररुप में यह स्मारक होलकर इतिहास की एक भव्य इमारत थी। जिसके साथ राजवंश के इतिहास की एक क्रमिक कहानी संलग्न थी । स्थापत्य की दृष्टि से यह भवन मुस्लिम मराठा व युरोपिय स्थापत्य मिश्रित रुप था। इसमें दक्षिणी हिस्सा उत्तर मुगल कालीन स्थापत्य एवं पूर्वी द्वार मराठा स्थापत्य तथा गणेश हाल, दरबार हाल, फ्रेंच शैली में बने थे ।


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