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होलकर राजवंश की कुलदेवता लोकदेव श्री मल्हारी मार्तण्ड



श्री मल्हारी मार्ता अर्थात् खंडोबा - होलकर राजवंश की कुलदेवता एवं लोक देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में :

महाराष्ट्र के शैवपंथीय देवताओं में खंडोबा लोकदेवताओं के प्रतिनिधि माने जाते हैं। वैष्णव दैवत के रूप में विठोबा तथा शक्ति देवता के रूप में म्हाळसा ये (आदि शक्ति देवी) तीनों लोकदेवता यजुर्वेदी - ऋग्वेदी ब्राह्मण क्षत्रिय मराठा, क्षत्रिय धनगर, सी.के.पी., साळी (सालवी), माली, तेली, तंबोली, सुनार, बंजारी, कसेरा (कासार) कुंभार, लिंगायत वाणी, सुतार, कुनवी, कोली, कोष्टी, (भोई-मछवारे), वर्जी, लोहार, चर्मकार, वडा (बलाई). मातंग समाज के मांग-महार, ये समस्त अठरापगड मराठी भाषिक जातियों के प्रतिनिधि के रूप में भी विद्यमान हैं और श्रद्धा से पूजनीय हैं। खंडोबा अर्थात् मल्हारी मार्तण्ड अपनी लौकिक तथा लोकधर्मीय प्रकृति को आज भी बनाए रखे हैं। मल्हारी मार्तण्ड के वाध्ये और मुरली (पुजारी के रूप में) आज भी मल्हारी वारी मोत्यानी द्यावी भरून तथा अनंत युगाचा देव्हारा मल्हारी देव जैसे नामों से सदानंदाचा येळकोट करते हुए विवाह - प्रसंग, धार्मिक पर्व, पारम्परिक शुभ अवसर पर लग्नसराई के दिनों में खंडोबा का जागरण का लोक कलां प्रकार संपन्न कराते हुए गाँव-गाँव, नगर-नगर में दिखाई देते हैं। नवविवाहित युगल जेजुरी के खंडोबा के दर्शन करने की परंपरा आज भी प्रचलित है। चंपाषष्ठी पर्व पर मंदिर में तळी भंडार आरती सामूहिक रूप से की जाकर बेल भंडार के साथ सुका खोबरा लुटाये जाने की परंपरा जेजुरी में, देश के विभिन्न मल्हारी मार्तण्ड मंदिरों में तथा 267 वर्ष पूर्व इन्दौर के होलकर राजवंश के कुलदेवता के रूप में राजव डे के मध्य मार्तण्ड देव स्थान मंदिर, माणिक बाग मार्ग के द्वितीय तुकोजीराव - काशीराव होलकर के 150 वर्ष पूर्व के कालखंड में निर्मित मल्हार मंदिर एवं तिलकपथ स्थित क्षत्रिय मराठा समाज द्वारा 100 वर्ष पूर्व निर्मित नये मल्हार मंदिर में एवं उषानगर में श्री शिव मल्हारी मार्तण्ड प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव समिति द्वारा नवनिर्मित मंदिर में भी श्री मल्हारी मार्तण्ड कुलदेवता के रूप में प्रतिष्ठित है।

श्री मल्हारी मार्तण्ड कथासार :

श्री मल्हारी मार्तण्ड महात्म्य ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि जिस भी व्यक्ति द्वारा श्री मल्हारी मार्तण्ड की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना, दर्शन, ग्रंथवाचन तथा ग्रंथश्रवण किया जाएगा उसे धन-धान्य, यश-कीर्ति, पुत्र-प्राप्ति होगी तथा शत्रु विनाश, भूत-पिशाच की बाधाओं से मुक्ति तथा उसके समस्त पापों का विनाश होकर उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। देवता एवं देवस्थान के ऐसे ही महात्म्य के कारण श्री मल्हारी मार्तण्ड आज भी जन-जन की आस्था के केन्द्र बने हुए हैं।

स्कंद पर्वत पर शिवजी ने मणि और मल्ल राक्षसों का वध खंडा से अर्थात् तलवार से किया उसी खंडा के कारण खंडोबा यह नामकरण हुआ। मल्ल राक्षस का वध करने वाले अर्थात् मल्ल के अरि मल्लारी यह नामकरण हुआ। मल्लारी से मल्हारी शब्द बना मार्तण्ड शब्द भी कन्नड़ शब्द मुखमंडल से मारि+तोंड = मार्तण्ड शब्द बना। शिवजी को मार्तण्ड भैरव भी कहते हैं। सूर्यदेव की पूजा ही मार्तण्ड भैरव की पूजा होती है। रविवार को मार्तण्ड भैरव अर्थात् मल्हारी मार्तण्ड का उपासना का प्रमुख दिन है। येळकोट शब्द का अर्थ होता है येळु अर्थात् कन्नड़ भाषा में सात संख्या वाचक शब्द है, मल्हारी मार्तण्ड की सात कोटि सेना ने मणि मल्ल राक्षस का सातवें दिन रविवार को वध किया इसलिए सदानंदाचा येळकोट येळकोट येळकोट जय मल्हार यह वीर रस पूर्ण शब्दों का जयघोष है। चांगभले शब्द का अर्थ होता है, सबका भला हो पृथ्वी पर भरपूर धनधान्य और सुखसमृद्धि हो। श्री मल्हारी मार्तण्ड की म्हाळसा एवंबाणाई नामक दो पत्निया थी । म्हाळसा धनगर समाज की तथा बाणाई लिंगायत समाज की थी। जेजुरी के चित्र में विठोबा जैसी मल्हारी मार्तण्ड की मूर्ति विद्यमान है। जिसमें मल्हारी मार्तण्ड सफेद धोती, परिधान किये हैं, सिर पर लालरंग का रुमाल, अंगा, और खंदे पर उपरना है। किंतु प्रचलित चित्रों में मल्हारी मार्तण्ड के मस्तक पर सोने का मुकुट दिखाई देता है और हाथ में खंडा लिये एक वीर योद्धा की मुद्रा में यह अश्वरूढ़ मल्हारी मार्तण्ड म्हाळसा देवी के साथ जो म्हाळसा ने भाले से राक्षस पर वार कर रही है इस प्रकार का चित्र है। खंडोबा के चार हाथों में खड़ग त्रिशूल, डमरु है जो शिवजी के अवतार के प्रतीक स्वरूप है। अश्व अर्थात् घोड़ा इनका वाहन है, और वाघ्या उनका प्रिय कुत्ता हमेशा उनके साथ रहता है। मणि और मल्ल राक्षस के साथ खंडा और भाला से मल्हारी मार्तण्ड का विजय होता है। और यह मल्हारी मार्तण्ड लोकदेव उपरोक्त समस्त जातियों के कुलदेवता के रूप में विराजमान है जो पृथ्वी पर सुखशांति, समृद्धि स्थापित करते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक परिवार में सुख शांति, समृद्धि बनी रहे यही छः दिन के मल्हारी मार्तण्ड के युद्ध का विजय दिवस चंपाषष्ठी पर्व है। चंपाषष्ठी के शुभ दिन पर कुळ धर्म संपन्न होता है। नया कांदा लसून के साथ बेंगन का भरता तथा बाजरे का रोडगा (रोटी) एवं पुरणपोळी का भोग (नेवैद्य) मल्हारी मार्तण्ड को चंपाषष्ठी के दिन अपर करते है। परिवार में बड़े बेटे के वैवाहिक कार्यक्रम के पश्चात् अथवा मानता (मन्नत) पूर्ण होने हेतु खंडोबा के जागरण गोंधल विधि हेतु पशु बली की (भेड़ या बकरा) प्रथा भी है। इसे चरखा भोग कहते है। किन्तु वास्तविक भोग मीठा -पुरणपोळी का ही मल्हारी मार्तण्ड को अर्पण किया है। एक भोग वाघ्या प्रतीक के रूप में कुत्ते को भी दिया जाता है।

खासगी ट्रस्ट द्वारा निर्मित जुना राजवाड़ा इंदौर का नवनिर्मित मल्हारी मार्तण्ड देवस्थान मंदिर :

इन्दौर के राजवाड़े के पुरातन मल्हारी मार्तण्ड देवस्थान का जीर्णोद्धार खासगी ट्रस्ट इन्दौर द्वारा 2 करोड़ की लागत से निर्मित है जिसका लोकार्पण श्रीमंत महारानी उषादेवी एवं श्रीमंत श्री सतीशचंद्रजी मल्होत्रा के करकमलों द्वारा 11 मार्च 2007 को सम्पन्न किया गया। यह देवस्थान अब अधिक सुंदर एवं आम जनता के लिए दर्शनीय बन गया है। इन्दौर के जूने राजबाड़े में होलकर राजवंश का यह श्री मार्तण्ड देवस्थान शान की परंपरा माना जाता है। सन् 2007 की दीपावली पर्व से इस मंदिर परिसर में श्री मल्हारी मार्तण्ड देव स्थान की तथा होलकर राजवंश की संक्षिप्त जानकारी के साथ देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा संपूर्ण देशभर में किये गये लोक कल्याणकारी एवं धार्मिक कार्यों के विवरण के साईज 13 बोर्ड डॉ. गणेश मतकर लिखित संयोजित चित्रमय प्रदर्शनी स्थाई रूप से खासगी ट्रस्ट द्वारा निर्मित की गई है। इस गौरवशाली ज्ञानवर्धक इतिहास का लाभ इन्दौर की जनता तथा बाहर से आए हुए सैकड़ों लोग प्रतिदिन ले रहे हैं। इस देवस्थान का दर्शन श्रद्धापूर्वक करते हैं। 250 वर्ष पूर्व हमारे मालवा (अब म.प्र.) में मराठों के आगमन के साथ-साथ होलकर राज्य संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होलकर ने अपने कुलदेवता के रूप में मल्हारी मार्तण्ड लोकदेव खंडोबा की इंदौर में प्रथम पूजा की है। होलकर राजवंश के कुलदेवता श्री मल्हारी मार्तण्ड को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। 

देश के विभिन्न स्थानों के प्रमुख मल्हारी मार्तण्ड मंदिर :

महाराष्ट्र में श्री मल्हारी मार्तण्ड जैसा लोकप्रिय देव अन्य कोई नहीं है। पुणे के पास जेजुरी नामक जगह को मल्हारी मार्तण्ड का प्रमुख ठाणा (स्थान) माना जाता है। वैसे जेजुरी से नैऋत्य में कड़े पठार ही प्राचीनतम मल्हारी मार्तण्ड का ठाणा (स्थान) कहा जाता है। समस्त भारत में मल्हारी मार्तण्ड के कुल 11 देवस्थान स्थापित है। महाराष्ट्र एवं कर्नाटक स्थित श्री मल्हारी मार्तण्ड के देवस्थान इस प्रकार है :- (1) जेजुरी पुणे के निकट कड़े पाठार एवं मुख्य मंदिर जेजुरी (2) निमगांव दावडी, पुणे (3) शेवुड अहमदनगर (4) कामथवाड़ी (5) सातारे- औरंगाबाद, (6) पाली-सातारा एवं कोल्हापुर (7) नळदुर्ग - धाराशीव, उस्मानाबाद (8) मंगसुळी, बेळगांव (9) मैलारसिंग, धारवाड़ (10) मैलार देवरगुड, धारवाड़ (11) मण्णमैलार, बेल्लारी। और मध्यप्रदेश में आलमपुर, मल्हारनगर म.प्र. में तथा जेजुरी और नलदुर्ग में कुलदेवता के रूप में सूबेदार मल्हारराव, लोकमाता अहिल्याबाई, यशवंतराव प्रथम, कृष्णाबाई, भागीरथीबाई, म्हाळसाबाई होलकर द्वारा मल्हारी मार्तण्ड के मंदिरों के निर्माण तथा जीर्णोद्धार का विवरण मिलता है। इन्दौर के राजबाड़े में चंपाषष्ठी के दिनों में बटी का नवरात्र तथा दशहरे के अवसर पर अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक नवरात्र एवं दशहरे से कोजागिरी पूर्णिमा तक जानाई देवी का नवरात्री में घट स्थापना की परंपरा रही है। देवघर में म्हाळसाई, बाणाई, यमाई, रंभाई, जानाई, तुळजाई तथा मरीआई, ऐसी सात आसरा देवी तथा म्हाळोबा, विरोबा, भैरोबा, खंडोबा, व्यंकोबा, पंचदेव भी है। मल्हारराव से लेकर 14 राजा तथा महाराणियों के स्मृति टाक भी है, हुजुर श्रीशंकर के गौरीशंकर तथा अश्व पर विराजमान खंडोबा की प्रतिमा एवं सामने पादुकाएं भी विद्यमान है।

इन्दौर का चंपाषष्टी पर्व:

श्री मल्हारी मार्तण्ड देवस्थान के लिए तथा माणिक बाग मार्ग के मल्हारी मार्तण्ड मंदिर में भी चंपाषष्ठी का उत्सव सबसे महत्वपूर्ण है। यह उत्सव मार्गशीर्ष शुद्ध प्रतिपदा से षष्ठी तक चलता है। इसे मल्हारी मार्तण्ड का नवरात्र (अर्थात् पंचरात्र) भी कहा जाता है। घटस्थापना की धार्मिक विधि संपन्न की जाती है। षष्ठी के दिन इस धार्मिक उत्सव की समाप्ति कुळधर्म के साथ की जाती है। चंपाषष्ठी पर्व पर मल्हारी मार्तण्ड की तळी भंडार आरती घर-घर में तळी उठाकर की जाती है। मंदिरों में बेल भंडार के साथ सुका खोबरा भी, बोल सदानंदाचा येळकोट बोलकर लुटाया जाता है। सन् 1984 में राजबाड़ा के गणेश हॉल में होलकर राजवंश की परम्परा के अनुसार सभी सामाजिक संस्थाएँ सामूहिक तळी भंडार आरती करती है। तळी भंडार में तांबे के पात्र में खंडोबा के टाक पर बेल भंडार किया जाता है। पाँच या अधिक संख्या में पुरुष लोक तळी उठाकर तळी भंडार आरती सामूहिक रूप से गाते है। इस प्रकार तळी तीन बार उठाने के बाद एक बार पान और एक बार टोपी या पगड़ी, पात्र के नीचे रखी जाती है और अंतिम बार दक्षिण दिशा में सूर्य की ओर भंडारा अर्पित करते हुए, दिवटी बुधली हाथ में रखकर आरती की जाती है। आरती के समय के बोल बोल सदानंदाचा येळकोट का जयघोष होता है। जेजुरी तथा इन्दौर के राजवाड़े में तथा समस्त उपरोक्त जातियों के अनुसार महाराष्ट्रीय परिवारों में तळी भंडार की जो आरती गायी जाती है, वह इस प्रकार है :-

जेजुरी में हमेशा तथा इन्दौर के राजवाड़े में

(सन् 1984 तक) तळी भंडार आरती इस प्रकार गायी जाती रही है।

अगडडुम नगारा, सोन्याची जेजुरी, निळा घोड़ा, पाव में तोड़ा । मस्तकी तुरा, बेंबी हीरा। अंगावर शाल, सदा हिलाल । म्हाळसा सुंदरी, आरती करी । देवी ओवाळी, नानापरी । खोबऱ्याचा कटका, भंडाराचा भड़का । अड़कल के भड़कल, भड़कल के भंडार। बोल बोल हजारी, बाघ्या मुरळी । खंडोबा भगत, सलाम सलाम । हर हर महादेव, चिंतामणी मोरया । आनंदीचा उदो उदो, भैरोबाचा चांगभले । सदानंदाचा येळकोट जय मल्हार, जय शिव मल्हार ! चांगभले । कडेपठार महाराज की जय, खंडेराव महाराज की जय ।। येळकोट येळकोट जय मल्हार !

आज की पारंपरिक तळी भंडार आरती राजवाड़ा में तथा यजुर्वेदी ऋग्वेदी ब्राह्मण समाजों, सभी महाराष्ट्रीय समाजों एवं सभी क्षत्रिय समाजों में चंपाषष्ठी एवं दशहरे के पर्व पर गायी जाती है। 

सदा नंदाचा येळकोट, हर हर महादेव चिंतामणी मोरया, आनंदाचा उदे उदे सोन्याची जेजुरी, मोत्याचा तुरा कंबरी कंदोरा, बेंबी हिरा पायी तोड़ा, मखमली जोड़ावरती शाल, सदा हिलाल देव मल्हारी, निळ्या घोडयावर शिकार खेळी, दुपार वेळी म्हाळसा सुन्दरी, आरती करी नाना परी, खोबऱ्याचा कटका भंडाराचा भडका बोल सदानंदाचा येळकोट हर हर महादेव जय मल्हार, जय खन्डोबा, जय खण्डेराया

खंडोबा का दशाक्षरी मंत्र जाप 

ॐ नमो मार्तण्ड भैरवाय

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