• स्वामी परमहंस योगानंद ने अहिल्याबाई को आधुनिक भारत की सबसे महानतम् महिला बताया है।
• वह बीड जिला महाराष्ट्र में गाँव चौढी में 1725 में पैदा हुई, उनके पिता मानकोजी शिंदे गांव के पाटिल थे जिन्होने उन्हें पढने और लिखने की शिक्षा दी।
• उनकी माता एक साक्षर एवं धार्मिक स्त्री थी एक बार मल्हार राव होलकर पुणे जाने के मध्य चौढी में रुके थे और उस युवा लड़की से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपनी बहू बनाने के लिए चुना।
• 1754 में खाण्डेराव (देवी अहिल्याबाई के पति) की मृत्यु के बाद मल्हारराव होलकर ने अहिल्याबाई को उनके उत्तराधिकारी के रूप में प्रशिक्षण देना शुरु किया ।
• उनकी अनुपस्थिति में अहिल्याबाई ने सफलतापूर्वक, प्रशासन और युध्द दोनों को प्रबंधित किया। एक उदाहरण देने के लिए एक महत्वपूर्ण परिस्थति में मल्हारराव ने एक संदेश भेजा " चम्बल को पार करके आप ग्वालियर के लिए प्रस्थान करें, आप वहाँ 4 या 5 दिन रुक सकती है। अपनी भारी तोर्पे व ज्यादा से ज्यादा गोला-बारूद की व्यवस्था कर लें तथा आगे प्रस्थान करते वक्त सड़क की सुरक्षा के लिए सैन्य चौकी स्थापित करें ।
• उन्हें 1766 में मल्हारराव एवं पुत्र मालेराव की मृत्यु के बाद राज्य की जिम्मेदारी सम्भालनी पडी।
• दिसंबर 1767 में राज्यभार संभालने के बाद, उन्होंने राज्य को भगवान शंकर को समर्पित कर यह घोषित किया कि वह राज्यों के मामलों में भगवान शंकर
की ओर से जनता के लिए स्वयं केवल एक संरक्षक होगी। उनके हस्ताक्षर "श्री शंकर" सभी शाही घोषणाओं में दिखाई दिए।
• उन्होने होलकर राज्य की राजधानी महेश्वर को बनाया।
• 18 वीं सदी की दूसरी छमाही में भारत में राजनीतिक अस्थिरता का समय था। यह एक सामाजिक और राजनैतिक उथलपुथल की अवधि थी।
• यह श्रेय उन्ही को है कि उनके 30 वर्ष के शासन काल के दौरान मालवा स्थिर और शांतिपूर्ण रहा और होलकर का वर्चस्व कम नहीं रहा और कभी भी हमला नहीं हुआ।
• यह उनके नेतृत्व और प्रशासनिक कौशल के बारे में बताता है।
• उन्होने वाराणसी के प्रसिध्द कांशीनाथ मंदिर सहित पुरे देश में आश्रम, मंदिरो धर्मशालाओ के निर्माण और पुन:निर्माण का एक विस्तृत कार्य किया।
• यह सब खासगी के माध्यम से किया गया था खासगी का अपना खजाना है। सामाजिक एवं आपराधिक मामलों में खासगी स्वतंत्र न्याय क्षेत्र था।
• खासगी संपत्ति इन्दौर राज्य में एक जागीर की प्रकृति में है और उसके पास किसी जागीरदार सरदार या मकान मालिक की तरह अंत र्निहित अधिकार है, जिसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती थी।
• सत्तारूढ़ रानी सर्वोच्च राजस्व और न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करती है जो केवल गम्भीर अपराधों के संबंध में महाराज को अपील करता है। रानी व्यापार के लेन देन के लिए दरबार रखती है। एक अलग सिंहासन, सील, प्रतिष्ठान और अलग-अलग नारों को उनके लिए शौक और उत्सव के अवसरो पर प्रस्तुत किया जाता है और उनके परिग्रहण के समय रानी सिंहासन पर बैठती है और उसी तरह एक सलाम प्राप्त करती है जैसे राजकुमार करता है।
• उन्होनें अपने शासनकाल के दौरान महेश्वर में कपड़ा उद्योग की स्थापना की। महेश्वरी साड़ियाँ पूरे भारत में प्रसिद्ध है एक तरह से यह कहा जा सकता है कि वह भारत में छोटे पैमाने पर उद्योगों का सबसे पुरानी प्रोत्साहक थी।
• व्यापार को उनके राज्य मे प्रोत्साहित किया गया था और कई व्यापारियों और किसानों ने विकास
किया।
• यात्रा की सुविधा और त्वरित संचार प्रदान करने के साधन के रूप में सड़के बनाई गई, पेड़ लगाए गये, कुएं खोदे और यात्रियों के लिए आराम घर स्थापित किए गए।
• महेश्वर अपने समय के दौरान साहित्य और कला का केन्द्र बन गया।
• उन्होने कई कारीगरो, मुर्तिकारो, कलाकारों को भी प्रोत्साहन दिया जो भवनों और किले में काम करने आऐ और महेश्वर को अपना घर बनाया।
• वह गरीब और जरूरतमंदो तक पहुंची, उन्हे शरण दी और विशेष रूप से उन्हे सम्मान दिया।
• उन्होने खासगी के माध्यम से कई कल्याणकारी गतिविधियां चलायी। खासगी का मतलब है कि केवल कल्याण और धर्मार्थ सक्रिताओं के लिए बनाया गया एक कौश।
अहिल्याबाई ने अपने शासनकाल में इस ट्रस्ट की स्थापना की थी। ट्रस्ट के पीछे का उद्देश्य होलकर वंश में महिलाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना था, ताकि धार्मिक स्थानों के रखरखाव के लिए उनको पुरुष समकक्षों पर निर्भर नहीं होना पड़े। उन्होने पूरे देश में दान के माध्यम से खर्च करके एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया जो केवल प्रांतीय या क्षेत्रीय नहीं था।
• पुरे देश को एकजुट करने की उनकी नीति के एक हिस्से के रूप में उन्होने गंगाजल को हर साल नियमित रूप से देश भर में फैले 34 धार्मिक स्थलों तक भेजे जाने की व्यवस्था की।
• गौतमा बाई के निधन के बाद अहिल्याबाई को निजी कोष विरासत में मिला।
• मल्हारराव के समय के दौरान वह स्वंय तीर्थ यात्रा पर विभिन्न स्थानों पर गई थी और इस प्रकार उन्हें पूरी तरह जानकारी थी कि तीर्थ यात्रा करने के लिए समस्याएँ आती है। हिन्दुत्व के लिए जितना भी किया उतना मुस्लिम फकीर और संतो को अनुदान दिया, उनका दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष था।
• उन्होंने पूरे भारत में नदियों पर घाटों का निर्माण किया, नए मंदिरों का निर्माण और क्षतिग्रस्त मंदिरो का पुनः निर्माण, कुएं खोदने और धन जमा कर, गरीबों, तीर्थयात्रियों के लिए मुफ्त सार्वजनिक रसोईघर भी शुरू किए। • उन्होंने न केवल मंदिरों का निर्माण किया बल्कि शास्त्रों पर चिंतन और उपदेश के लिए ज्ञानी पंडितों की देखभाल के लिए भी भुगतान की व्यवस्था की।
• उन्होंने अपने सभी धर्मार्थ काम बहुत व्यवस्थित तरीके से किए। इसी कारण से वह देश भर में लगभग हर महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान पर सुविधाएं बनाने में सक्षम रहीं। बद्रीनाथ और केदारनाथ से रामेश्वरम तक जगन्नाथपुरी से द्वारका और सोमनाथ तक अहिल्या माँ साहब की छाप दिखती है, इन के रखरखाव के लिए एक अलग कोष विशेष रूप से आंवंटित किया गया था यही कारण है कि आज भी उनके सभी योगदान जिवित है।
• उनके द्वारा बनाए गए ढांचे न केवल तकनीकी रूप से सही है बल्कि सौदर्यवादी रूप से उत्तम उदाहरण भी है। • अहिल्याबाई ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुननिर्माण किया, जो कि 1669 ईसवी में औंरगजेब सहित कई मुस्लिम आक्रमणकारियों की सेनाओं द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था कई तरह से और कई क्षेत्रों में वह अच्छी तरह से अपने समय से आगे थी।
• अहिल्याबाई तब और अब भी एक संत के रूप में प्रतिष्ठित है।
● मूर्तिकारों और कारीगरों के लिए उन्होने कहा कि इस होलकरी छेनी को लगातार काम करना चाहिए, निर्माण कार्य बंद नहीं होना चाहिए।
• अहिल्या माँ साहब 13 अगस्त 1795 को स्वर्ग सिधार गई ।

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