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यशवंत राव होलकर प्रथम

• अक्टूबर 1802 में उन्होने पूणे की लड़ाई में सिंधिंया और बाजीराव पेशवा की संयुक्त सेना को हराया, इस लड़ाई के वास्तव में कुछ दूरगामी प्रभाव हुए।

• यशवंत राव के हाथो हारकर पेशवा भाग गए जिससे यशवंत राव होलकर के हाथमें मराठा राज्य की बागडोर आ गई, इससे मराठा संघ का विघटन हुआ और भारत में ब्रिटिश सत्ता की सर्वोच्चता की स्थापना हुई।

• उन्होंने अमृतराव को पेशवा के रूप में नियुक्त किया और 13 मार्च 1803 को इन्दौर लौटे।

• यशवंत राव की बेचैन आत्मा को शांति नहीं मिली और वह आक्रमक तरीके से आगे बढ़े।

• उन्होने पहले ही सेंधवा, चालीसगाँव, धुलिया, पारोल, नेर, अहमदनगर, राहुर नाशिक, सिन्नर, डोंगरगांव, थलनेर और जेजुरी और कई अन्य स्थानों पर विजय प्राप्त की थी।

जनरल वेलेस्वी को एक पत्र में उन्होने मांग की थी:-

1. शुल्क इकट्ठा करने के लिए होलकरों का अधिकार मान्यता प्राप्त होना चाहिए। 

2. दोब में होलकर परिवार के पुश्तैनी दावे और बुंदेलखंड में एक परगना के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए।3. हरियाणा राज्य जो पूर्व में होलकर का था उसको आत्मसमर्पण करना चाहिए। 

4. अब राष्ट्र का दायित्व होलकरों के अधिन कर देना चाहिए और कहा- "हालांकियुद्ध में हम आपकी तोपो का विरोध करने में असमर्थ है, किर भी कई मीलों फैले राज्य को में उखाड़ फेका जाएगा और लुट लिया जाएगा। ब्रिटिशों को एक पल के लिए भी साँस लेने के लिए अवकाश नहीं होगा और मेरी सेना के निरतंर हमलो से विनाश होगा।

• यशवंत राव अंततः भौंसले राजा से बचकर 1798 में भाग गए और अपनी छोटीसेना बनाने में कामयाब हुऐ और उत्तर खानादेश पर छापा मारा।

• जब काशी राव को उनके ठिकाने के बारे में पता चला तो उन्होंने उनके खिलाफअभियान चलाया।

• यशवंत राव ने बड़वानी के पास नर्मदा को पार किया और धार में पहुंचे, जहां उन्हेंधार के शासक ने शरण दी।

• इस समय तक यशवंत राव ने अपनी ताकत बढा ली थी।

• यशवंत राव खुले तौर पर काशी राव और सिंघिया के खिलाफ हो गए।

• दिसंबर 1798 में यशवंत राव होलकर ने शेवेलियर डुडर्स की सेना को हराया और महेश्वर पर कब्जा कर लिया, जनवरी 1799 में उन्हें राजा का ताज पहनाया गया। 

• 1800 की शुरुआत से यशवंत राव ने सिंधिया के खिलाफ हार और भारी नुकसान के तहत अभियान चलाया।

• सिंधिया ने इंदौर में तबाही करके बदला लिया, जो होलकर ने उज्जैन शहर (उज्जैन सिंघिया की राजधानी) में किया था ।

• इंदौर के राजवाड़ा को जला दिया गया और अत्याचार किए गए।

• यशवंत राव ने रतलाम के रास्ते पर उत्तर की तरफ राजस्थान जाने की ओर बढ़ गए।

• जब जनरल पेरॉन के एजेंट ने एक संदेश के साथ उनका दौरा किया,"यशवंत राव ने अपने घोडे और भाले की तरफ इशारा करते हुए कहा- जब तकमुझे सोने के लिए छाया और निर्वाह के साधन मिलेंगे, मेरे घोड़े की जीन कसी रहेगी तब तक राज्य का प्रभुत्व कायम रहेगा।

• 4 मार्च 1804 के पत्र में जेन लेक को लिखा, मेरा राज्य और संपत्ति मेरे घोडे की काठी पर है, मेरे बहादुर योद्धाओं के घोड़ों की कमानें किसी भी दिशा में बदल दी जाएंगी, पूरा राज्य उस दिशा में मेरे कब्जे में आ जाऐगा, आप बुद्धिमान और भरोसेमंद है, आप इस मामले के परिणामों पर विचार करेंगें और महत्वपूर्ण मामलों को सुलझाने में खुद को नियोजित करेंगे जिन्हें मेरे द्वारा समझाया जाएगा।

• जून 1804 में यशवंत राव होलकर ने बुंदेलखंड में ब्रिटिश सेना को हराया जिससे अंग्रेजों का अपमान हुआ।

• अगले महीने उसने मुकंदरा और कोटा में फिर से ब्रिटिशों सेना को हरा दिया। उसी साल उसने ब्रिटिशों को नुकसान पहुंचाया, अक्टूबर 1804 में दिल्ली पर हमला करके मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को जोकि अंग्रेजों द्वारा कैद कर लिया गया था, आजाद किया गया।

• शाह आलम ने उन्हें महाराजधिराज राजराजेश्वर आलिजहा बहादुर का खिताबदिया।

• यशवंत राव की बहादुरी और सैन्य कौशल को समझते हुए अंतत:24 दिसंबर 1805 को राजपूर घाट की संधि में संपन्न कर दी गई।

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