• एक विनम्र स्थिति से बढते हुए, होलकर वंश के संस्थापक बने मल्हार राव को भारत के बेहतरीन जनरलों में शामिल होने के लिए मूल्यांकित किया गया ।
• जेजुरी (अब पुणे जिले में ) के निकट होल गांव में वर्ष 16 93 में जन्में । • कम आयु में पिता के निधन के बाद उनकी माँ अपने भाई के गांव चली गई।
• एक युवा लड़के के रूप में मल्हार राव स्थानीय भूमि स्वामी के घुड़सवार समूह के साथ कुछ समय के लिए एक सैनिक के रूप में सेवा रहे। • 26 वर्ष की आयु में 1719 में उन्होने पेशवा बालाजी विश्वनाथ के सैन्य अभियानो में भाग लेना शुरू कर दिया।
• एक सैनिक के रूप में मल्हार राव होलकर की पहली बड़ी उपलब्धि, बालाजी विश्वनाथ की सेना के अंतर्गत दिल्ली में उनके अभियान और विजय में थी मुगल शासक फारुखशियेर को सैय्यद भाईयों द्वारा पकड़ा गया था और उन्हें त्याग दिया गया था।
• 1720 में उन्होने फिर से निजाम के खिलाफ बालापुर की लड़ाई में एक प्रमुख भूमिका निभाई ।
• वह जल्द ही पेशवा बाजीराव के विश्वसनीय कमांडर के रुप में उभरे और उनके सैन्य कौशल की वजह से रैंकों में आगे बढना शुरु हो गया और कई अभियानों में भाग लिया।
• 1732 तक वह पश्चिमी मालवा का एक बड़ा हिस्सा कई हजारों की एक घुड़सवार सेना के साथ नेतृत्व कर रहे थे।
• मल्हार राव को इस कार्य से बल मिला।
• उन्हें 1748 की रोहिल्ला अभियान के लिए एक शाही सरदेशमुखी प्रदान किया गया था मल्हार राव जल्द ही पश्चिमी मालवा के निर्विवाद नेता बन गए और एक कद प्राप्त किया जिसने उन्हें उत्तर भारत में विशेष रुप से शासको के बीच विवादो को सुलझाने में सक्षम बनाया।
• 1754 में कुम्हेर किले (अब भरतपुर जिले, राजस्थान) की घेराबंदी के दौरान लड़ाई में उनके एकमात्र पुत्र खांण्डेराव की मृत्यु हो गई ।
• 1757 में वे पेशवा के कमांडर-इन-चीक (सुबेदार) बने ।
• उन्होने महाराजा के खिताब को अपनाने के बजाय सुबेदार मल्हारराव होलकर के नाम को पसंद किया।
• 1747 में उन्होने तत्कालीन मौजूदा स्थल पर राजवाड़ा का निर्माण शुरु किया, जिसका नाम हाकिमबाडा था। हाकिमवाडा अरबी में हाकिम शब्द का अर्थ है एक शासक, राज्यपाल या न्यायाधीश । जिस स्थान पर उन्होने इन्दौर में अपना पहला शिविर स्थापित किया था,
• आज उसे मल्हारगंज के रूप में जाना जाता है।
• कानपुर के पास एक लड़ाई में चोट लगने के बाद अलामपुर (लाहर तहसील, भिन्ड जिले एम.पी.) में 1766 उनका निधन हो गया।
• वह तब 73 वर्ष के थे, यह उनकी तन्दरुस्तीऔर एक सैन्य शक्ति का नेतृत्व करने की क्षमता के बारे में बताता है।
• देवी अहिल्याबाई ने उनकी याद में आमलपुर में एक सुन्दर छत्री का निर्माण किया। • वह लड़े और करीब 50 से अधिक लड़ाईयों जीती। उनमें से कुछ निम्न है :- बाजीराव पेशवा के नेतृत्व फाल्केड़ की लड़ाई 1728 जिसमें निजाम पराजित हो गया था। मल्हार राव ने मराठो को सामरिक लाभ देने के लिए आपूर्ति और संचार काट दिया। यह युध्द चपल युद्ध के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है। यहां तक कि एफडी मार्शल मॉन्टगोमेरी ने अपनी पुस्तक युद्ध का इतिहास में इसका उल्लेख किया है।
• 1739 तल भोपाल में निजाम को हाराया।
• चिमाजी ने अप्पा के नेतृत्व में पुर्तगाली से बेससीन (अब वसई) का किला। दोब क्षेत्र में अफगानों को हराया और बाद में नजीब ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस समय दिल्ली में नजीब-उद-दोलाह रोहिल्ला नेता का नियंत्रण था। इससे मराठो ने दिल्ली के वास्तविक शासकों को बनाया और आलमगिर द्वितीय किसी वास्तविक ताकत के बिना सिर्फ एक प्रमुख बने रहे।
• मल्हारराव ने आधार क्षेत्र के रूप में दिल्ली का प्रयोग किया और मल्हारराव ने
• 1758 में सरहिन्द का कब्जा किया और जल्द ही लाहौर भी कब्जे में आ गया।
• हालांकि पानीपत की तीसरी लडाई मराठों को एक गंभीर झटका था, लेकिन युद्ध के बाद यह मल्हारराव होलकर की वजह से था कि मराठा साम्राज्य को उत्तर भारत में संरक्षित किया जा सकता था।
• यह मल्हारराव की प्रतिबद्धता और सेन्य नेतत्व था जो मराठों को मदद करता था। जिससे उन्होने लाहोर तक विजय प्राप्त की जो अब पाकिस्तान में है।
• कोई आश्चर्य नहीं कि एक राजस्थानी कवि ने उनकी बहादुरी की प्रशंसा करते हुए लिखा;
अइयों बखत मल्हार का, अइयों बखत अबीह! गरजण लागा गड़री, दर्पण लागा सीहं !!
सिंहा सिर नीचा किया गाडर करें गलार ! अधपतियाँ सिर ओधीणी, तो सिर पर पाघ मल्हार !!

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