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इंदौर के बारे में कुछ रोचक जानने वाली बातें

 पंढरीनाथ मंदिर का इतिहास

महाराष्ट्र में चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पंढरपुर मंदिर के स्वरुप को इंदौर मे स्थापित करने के लिए सरस्वती नदी के किनारे स्थान खोजा गया, जो हूबहू पंढरपुर की तरह ही है। सरस्वती नदी किनारे के इस स्थान को उपयुक्त माना गया और यहां पंढरीनाथ मंदिर की स्थापना की गई। इस मंदिर के पास में ही प्राचीन इंद्रेश्वर मंदिर भी है। पंढरीनाथ मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए सीढ़िया हैं। इसके मुख्य द्वार के स्तंभों पर भगवान शिव के पुत्र गणेश और कार्तिकेय को अंकित किया गया है। गर्भगृह में भगवान विष्णु के विट्ठल स्वरूप की मूर्ति प्रतिष्ठित है। जलाभिषेक से निकलने वाले जल के लिए यहां मगर की आकृति का जल प्रवाहित स्थान बनाया गया है। मंदिर के शिखर पर पीतल का का कलश स्थापित किया गया है। इस मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया गया है। मंदिर का मुख्य मंडप दो स्तंभों पर टिका हुआ है। मंदिर के बाह्य भाग में तीनों ओर प्रतिमाविहीन कुलिकाएं है। मंडप का आकर गुंबदनुमा है, जिसे मराठा शैली में बनाया गया है। मंदिर के शिखर में अरूश्रृंग और कलश बनाए गए है। मंदिर का शिखर उत्तरोत्तर कम हो जाता है ये उत्तर भारत की शिल्पकला को इंगित करता है। इसके निचले भाग में खुरक, घड़े की आकृतियां उकेरी गई है।


इंदौर की गुड़ी पड़वा

• हाथी पर आते थे श्रीमंत

• घोड़ों के लिए बिछती थी जूट की पट्टियाँ

होलकर रियासत में वर्ष प्रतिपदा गुड़ी पड़वा पर संपूर्ण राजवाड़ा के अंदर व बाहर की सफाई होती थी, पानी का छिडकाव होता था. नववर्ष का प्रथम दिन होने के कारण सुबह राजवाड़े में ध्वजारोहण होता था। ध्वजारोहण के लिए नवीन जरीपटका तैयार कर देवधर को चौक में खड़ा किया जाता था। भालेकरी बेडया की निशानी भी इसी जगह खड़ी की जाती थी। राजवाड़े के सामने के चौक में नवीन ढालें खड़ी की जाती थी। जरीपटका खड़ा करने के बाद सेना द्वारा बंदूक के पाँच चक्र से सलामी दी जाती थी। राजवाड़े मे श्रीमंत के आने-जाने के मार्ग पर लाल गलीचे बिछाए जाते थे। पूजा में आने वाले घोड़े के पैर फिसले नही इसलिए फर्श पर जूट की पट्टियाँ बिछाई जाती थी। गार्डन डिपार्टमेंट द्वारा फूल-पौधो गमलों द्वारा राजवाड़े को श्रृंगारित किया जाता था।

200 साल से राजसी ठाठ से विराज रहे है होलकर के गणपति

इदौर में गणपति उत्सव का इतिहास 200 साल से ज्यादा पुराना है। मालवा के अधिपति रहे होलकर राजघराने में गणपति उत्सव धूमधाम से मनाने की परंपरा रही है, जो पांच दिन मनाया जाता था। इसकी शुरूआत तुकोजीराव होलकर द्वितीय (1844 1886) के शासनकाल में हुई थी। होलकर स्टेट में गणेश उत्सव मनाने की गौरवशाली परंपरा का निर्वहन अब भी गणपति स्थापना व पूजन के साथ हो रहा है। होलकर स्टेट के कुल देवता मल्हारी मार्तंड के मंदिर के सामने चौकी पर इंदौर के राजा गणपति पांच दिन के लिए विराजते हैं। तीसरे दिन उनके साथ महालक्ष्मी की मूर्ति स्थापित की जाती है। पांचवे दिन गौरी-गणेश विसर्जन किया जाता है।

सौंदर्य और संस्कृति का मेल शीशमहल एवं कांच महल
कांच, मार्बल पत्थर की अद्भुत कलाकारी और खूबसूरती का अनूठा रूप है शहर के बीचोंबीच बसा शीशमहल। यह इंदौर के सौंदर्य और संस्कृति को तो बयां करता ही है, साथ ही शहर के अद्वितीय इतिहास और स्थापत्य कला से भी रूबरू कराता है। सेठ हुकुमचंद ने अपने निवास के लिए इसे सन् 1922 मे बनवाया था। कहा जाता है कि सेठजी को रचनात्मकता पसंद थी इसलिए उन्होने पास ही मे कांच से बना मंदिर तैयार करवाया। इस मंदिर का रास्ता घर के अंदर से ही होकर जाता है। उस जमाने मे सेठजी के राजसी ठाठ-बाट का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि कांच मंदिर के लिए ग्लास बेल्जियम से आते थे। करीब एक हजार स्क्वेयर फीट के एरिये मे फैला यह आलीशान महल जी प्लस थ्री है। संगमरमर और इटेलियन टाइल्स से शीशमहल को आकार दिया गया है। दिवारो पर आरास का प्लास्टर है, जिसमें मार्बल का चूरा व चूना मिलाकर तैयार किया जाता था। इससे दिवार पर बार-बार पेंट करने की जरूरत नही होती। सेठजी ने रंगमहल और मोतीमहल भी बनवाया था। ग्राउंड फ्लोर पर हाथी, घोडे और बग्घी बांधे जाते थे। शीशमहल के टॉप फ्लोर पर अखाड़ा था जहां सेठजी कसरत करते थे। यहां आज भी अखाड़ा लगता है। दूरदृष्टि में विश्वास रखने वाले सेठजी ने महल में ही स्विमिंग पुल का निर्माण करवाया था। कांच मंदिर को ईरान व जयपुर के कारीगरों ने बनाया। इसमें हर तरफ नजर दौड़ाने पर कांच की आकृतियां दिखाई देती है। मंदिर की छत, दिवारें, खंभे कांच से बनाए गए है। मंदिर में लगा चांदी का दरवाजा आज भी लोगों को आकर्षित करता हैं यहां भगवान शांतिनाथ भगवान (मूलनायक) व आसपास आदिनाथ, चंद्र प्रभु की मूर्तियां है। आज भी यहां क्षमावाणी, महावीर जयंती, निर्वाण उत्सव आदि पर दिगंबर जैन समाज के लोग जुटते है।

इंदौर के मडिकल कॉलेज का इतिहास

सन् 1870 में इंदौर के रेंसीडेंसी क्षेत्र में एक चिकित्सा कक्षा प्रारंभ हुई। सन् 1878 में इसी कक्ष को किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल बनाया गया व सन् 1881 में डॉ. ब्लू मांट के प्रयत्नों से स्कूल शुरू हुआ। यह इमारत मूल रूप से डेली कॉलेज की थी, जिसे केवल पांच हजार रूपए में किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल के लिए बेचा गया। डॉ.ब्लू मांट व डॉ.सर जेम्स राबर्ट यहां के नेत्र चिकित्सक रहे। सन् 1951 मे इसी स्कुल मे महाराजा यशवंतराव की महारानी ने सेठ गोविंदराम सेकसरिया हृदय रोग विभाग का उद्घाटन किया। इंदौर के प्रमुख चिकित्सक जैसे डॉ. एस. के. मुखर्जी, डॉ. गिरीश सिपाहा, डॉ.आर. एस. मेहता, डॉ. सरजू प्रसाद तिवारी आदि यहां शिक्षक रहे।
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